Sunday, 21 April 2019

चतुःश्लोकी भागवत

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय चतुःश्लोकी भागवत

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।।१।। 

अर्थ-सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही मैं था । मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न दोनों का कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नही है, वहाँ मैं ही मैं हूं और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूं, और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ।।१।।

ऋतेऽर्थं यत् प्रतियेत न प्रतियेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ।।२।।

अर्थ-वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चन्द्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश मंडल के नक्षत्रों में राहु की भांति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिए ।।२।।

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।३।।

अर्थ-जैसे प्राणियों के पंचभूत रचित छोटे बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी है और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारण रूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नही भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ।।३।।

एतावदेव जिज्ञास्यंतत्त्व जिज्ञासुनाऽऽत्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।।४।।

अर्थ-यह ब्रह्म नही, यह ब्रह्म नही - इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है - इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवम सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है, वे ही वास्तविक तत्व है। जो आत्मा और परमात्मा का तत्व जानना चाहते है, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है।।४।।

कृष्णं नारायणं वन्दे कृष्णं वन्दे व्रजप्रियम्।
कृष्णं द्वैपायनं वन्दे कृष्णं वन्दे पृथासुतम्।।


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